सोमवार, 16 जनवरी 2012

ये महज लफ्ज नहीं...

न जाने प्यार के ढ़ाई रुहानी अल्फाजों का जादू कहीं खो गया है, या फिर समाज ने उसकी गरिमा, सौंदर्य और मर्यादा का चीरहरण कर दिया है। तमाम शायर, कवि और लेखकों ने न जाने कितनी बार इसके दर्शन को अपने शब्दों में उकेरा। ये ढाई अक्षरों का विस्तार असंख्य किताबों, फिल्मों और साहित्य सहित दर्शन में सिमटा पड़ा है। बावजूद इसके इन बेमानी से लगने वाले लफ्जों की रूहानियत पे लिखे जाने की आज भी गुंजाइश बाकी है। सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी इंसान ने इसे खूबसूरत विरासत की तरह सहेज कर रखा है। बदलाव कितने भी हुए हों... इश्क को समझने इसमें डूबने और मर मिटने वालों ने खुदा की इस नियामत को बुलंदियों तक पहुंचाया है। रियासतें गईं दौर आए और गए मगर कुछ तो है साकिया जो इस नशे में झूमने वालों की किसी दौर में कोई कमी नहीं रही। जज्बात के इस रूहानी अहसास में महज जिस्मों की भूख के इतर भी कुछ है। बदलते दौर और नए खयालात ने इसकी रूहानियत को बेजार भले किया हो, मगर किसी एक के लिए जिंदगी बसर करने वालों की कमी आज भी नहीं है और इश्क में ताउम्र डूबे रहने वाले हर दौर में मिलते हैं। इतिहास के पन्नों में दर्ज ये अफसाने महज किस्से नहीं, दो इंसानों की जिंदगी का सफरनामा है। मुझे तो लगता है प्यार की भावना तो आज भी जिंदा है किसी न किसी स्वरूप में लेकिन इन ढ़ाई अक्षरों का जादू कहीं खो सा गया है। शायद इतनी बार बोला सुना और कहा गया है कि इसकी गंभीरता मर सी गई है। शब्दों में बहुत ताकत होती है, दो शब्द किसी की जिंदगी बदलने या उसके आत्मपरिवर्तन के लिए काफी हैं। मूल भावना को छेडऩे की जुर्रत आज तक शायद कोई गुस्ताख नहीं कर पाया। यही इसका मर्म है, जो कभी अंदर से बहता है, तो कभी रुक जाता है।

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